बुधवार, 30 दिसंबर 2009

जानिए मेरे बारे में मीठी हकीकत

जानिए और कुछ सीखिए...मेरा बचपन बेहद बदतमीजी में गुजरा...बचपन से ही गाली देने और दूसरों के कपड़े फाड़ने का शौक था। घरवालों ने मेरे हुनर को पहचाना और गली मोहल्ले में अपना सिक्का जमाने की छूट दे दी। उम्र बढ़ती गई और प्रतिभा निखरती गई...कुछ समाजसेवियों ने मुझे स्कूल भिजवाने की लाख साजिशें रची लेकिन कामयाब नहीं हो पाए...घसीटते हुए स्कूल की चौखट तक ले भी गए लेकिन नाम नहीं लिखवा पाए...उस समय जोश था..जिस्म में ताकत थी...तब लिखना नहीं सीखा था...मीडिया से वास्ता नहीं पड़ा था...हेडर और क्रोमा से लगाव नहीं था...इसलिए हेडक नहीं होता था...हेडक करता था। 15 को होते होते मैने खूब नाम कमाया..जिस गली से गुजरता लड़कियां रास्ता बदल लेतीं...सम्मान हो तो ऐसा। कहते हैं मेहनत से कुछ भी करो बेकार नहीं जाता..यही मैने सीखा और इसी की बदौलत थाने तक मेरी हाजिरी लगने लगी। मोहल्ला सुधार समिती को अब मेरी सुध आ गई थी...15 अगस्त को मेरा सार्वजनिक अभिनंदन किया गया। मुझे फूलों से लाद दिया गया...सबने एक सुर में कहा आप हमारे मोहल्ले की शान हैं...कुछ बड़ा करो, ये मोहल्ला तुम्हारे लायक नहीं है..यहां से निकल जाओ...इतना प्यार, इतना दुलार। मैं भावुक हो गया। मुझे लगा, मुझे जरुर कुछ बड़ा करना चाहिए..मैने कल्याण मंत्रालय में अर्जी दे दी और महज तीन दिन में मुछे तिहाड़ जेल में इंटर्नशिप करने का ऑफर आ गया। मैने मौके को भुनाया और पूरे तीन साल तिहाड़े में काटे । वहां भी मैं छा गया...मैने कई कैदियों के सिर फोड़े, कई पुलिसवालों की वर्दियां फाड़ी..आला अफसरों को भी खूब नाच नचवाया। जेल में सब मेरे आदर्शों को अपनाने लगे थे..कैदियों को लगने लगा था उनका मसीहा आ गया। मैं पप्पु यादव, रोमेश शर्मा, अबु सलेम जैसा बनने ही वाला था, लेकिन अचानक मेरे जीवन में सुनामी आ गई और मैं मधु कोड़ा जैसा करियर बनाने से चूक गया। वहां एक ऐसा अफसर आया जिसने मेरे पैरों में किताबों की बेड़ियां डाल दी...मुझे कई-कई घंटे पढ़ाया जाता..लिखने के लिए दिया जाता..मैं चिखता चिल्लाता लेकिन मेरी आवाज जेल के दीवारों से टकराकर लौट आती। जब सफेदपोश जेल में आते तो उन्हें बताया जाता देखो इसे दुनिया में जीने के काबिल बना दिया है। अब ये गरजता नहीं है..चुप रहता है। इसके कानों में हमने ज्ञान के अक्षर पिघलाकर डाले हैं। इसे ऐसी बेड़ियों में जकड़ा है जिससे ये ताउम्र बाहर नहीं आ सकेगा। जेल से मैं 20 साल का होकर बाहर आ गया। बाहर आते ही मुछे एक अखबार में तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। वहां खूब लिखने को देते...और खूब पढ़ने को कहते। मैं अंदर ही अंदर घुट रहा था..कोई मेरे दर्द को समझ नहीं सका..वक्त की मार पड़ी और मेरे गले में प्रेस का बिल्ला टांग दिया गया। लेकिन दोस्तों और मोहल्लेवालों ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। खूब सहानुभूति दिखाई..मुझ पर तरस खाया। कई की तो आंखे छलछला उठी..बताओ क्या से क्या बना दिया। ये भी कोई जिंदगी है। एक वो दिन था जब मैं खुद खबर बनता था, आज खबर बनाता हूं..ऐरों-गैरों की। इसके बदले मिलता ही क्या है। सिर्फ चूल्हा चल पाता है..लेकिन इसमें वो मजा कहां...जब तक लोगों के दिल ना फूंको गरमाई कहां आती है।
आपका ही
सर शोभाराम

नया साल आ गया है, होश ना खोएं..ये हर साल आता है, अभी तक कुछ बदला क्या?

1 टिप्पणी:

  1. आपकी साफगोई के तो हम कायल हो गए। खुदा करें कि ख़बर खतरनाक आपका पीछा छोड़े औऱ आप एक बार फिर खुद ख़बर बने सर शोभाराम साधुवाद...

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